खोदावंदपुर/बेगूसराय। जिले के लीची उत्पादक क्षेत्रों में इन दिनों फल एवं शाखा बेधक कीट का प्रकोप तेजी से देखा जा रहा है, जिससे फसल को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ गयी है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह कीट वर्ष के अलग-अलग समय में पौधों के विभिन्न भागों को प्रभावित करता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है. मिली जानकारी के अनुसार सितंबर-अक्टूबर माह में यह कीट लीची के नये कोमल शाखाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे विशेषकर नये बागों की वृद्धि रुक जाती है. वहीं अप्रैल-मई के दौरान यह विकसित हो रहे और पकने वाले फलों के डंठल में छेद कर देता है, जिससे फल समय से पहले गिरने लगते हैं. प्रभावित फलों के अंदर लार्वा एवं कीट की गंदगी पायी जाती है. इस कीट की पहचान का प्रमुख लक्षण यह है कि पूर्ण विकसित लार्वा फल से बाहर निकलकर पत्तियों की सतह पर जाला बनाकर प्यूपा अवस्था में परिवर्तित हो जाता है.
कीट प्रबंधन के उपाय:-
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि सितंबर माह में थायाक्लोप्रिड 21.7 SC या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 0.5–0.7 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें. फूल आने से पहले नीम तेल @ 4 मि.ली. प्रति लीटर का छिड़काव करने से कीट के अंडे देने की प्रक्रिया को रोका जा सकता है. फल बनने के 10-12 दिन बाद (जब फल लौंग के आकार के हों) ल्यूफेन्यूरॉन 5 EC @ 0.7 मि.ली./लीटर या नोवाल्यूरॉन 10 EC @ 1.5 मि.ली./लीटर का छिड़काव करें. इसके बाद गूदे के विकास के समय साइपरमेथ्रिन 5 EC @ 0.5 मि.ली./लीटर या इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG @ 0.4 ग्राम/लीटर पानी का प्रयोग करें. तुड़ाई से करीब 10 दिन पहले अंतिम छिड़काव नोवाल्यूरॉन या साइपरमेथ्रिन से करना लाभकारी होगा.
किसान सिंचाई प्रबंधन पर दें विशेष ध्यान:-
विशेषज्ञों का कहना है कि असमान नमी के कारण लीची में फल फटने (क्रैकिंग) की समस्या बढ़ जाती है. इसके लिए बाग में नियमित और हल्की सिंचाई करते रहें तथा मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखें. लंबे अंतराल के बाद अचानक अधिक पानी देने से बचें. पेड़ों के नीचे घास या सूखी पत्तियों से मल्चिंग करने पर नमी संरक्षित रहती है और फल फटने की संभावना कम हो जाती है. फल क्रैकिंग को नियंत्रित करने के लिए 15 दिन के अंतराल पर बोरॉन @ 1 ग्राम/लीटर पानी का 2–3 बार छिड़काव भी उपयोगी बताया गया है.
उर्वरक प्रबंधन से बढ़ेगा उत्पादन:-
इस समय पौधों को संतुलित पोषण देना भी अत्यंत आवश्यक है. प्रति पेड़ 500-600 ग्राम यूरिया और 600 ग्राम पोटाश (MOP) देने की सलाह दी गयी है. उर्वरकों को पेड़ के तने से लगभग 1 मीटर दूरी पर एक फीट चौड़ी गोलाई में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें. विशेषज्ञों के अनुसार समय पर कीट नियंत्रण, सिंचाई और पोषण प्रबंधन अपनाने से न केवल फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है, बल्कि बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है.