डी ए पी की कमी को पूरा करेगा पूसा पी एस बी: डॉ रामपाल

खोदावंदपुर,बेगूसराय। फॉस्फेटिक उर्वरकों की बढ़ती माँग और घटती उपयोग दक्षता के कारण खेती प्रभावित हो रही है. इस समस्या को कम करने के लिए डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में राजेंद्र पूसा पी एस बी नामक जैव तरल का विकास किया गया है. इसका प्रयोग फसल में बुवाई के समय करने से प्रति हेक्टेयर 20-30 किलोग्राम तक फॉस्फेट की उपलब्धता में वृद्धि होती है तथा अगली फसल के लिए भी फॉस्फेट अवशेष के रूप में मिट्टी में बना रहता है. इसके उपयोग से जहाँ फॉस्फेटिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, वहीं उपज में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि भी होती है. इसकी जानकारी देते हुए खोदावंदपुर कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान सह वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ राम पाल ने बताया कि किसान इसे मृदा सूक्ष्म विज्ञान विभाग, पूसा या कृषि विज्ञान केंद्र, बेगूसराय से खरीद सकते हैं. यह मिट्टी में मौजूद फॉस्फेट को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराता है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ाती है. उन्होंने बताया कि  इसकी 1 लीटर मात्रा को 200 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी हुई खाद में बुवाई से 12 घंटे पहले अच्छी तरह मिलाकर खेत में प्रयोग करना चाहिये.