राजेश कुमार,खोदावंदपुर/बेगूसराय। जहां एक ओर सरकार शिक्षा को विकास की सबसे बड़ी कुंजी बताती है, वहीं दूसरी ओर गांवों की धरती पर आज भी ऐसे विद्यालय मौजूद हैं, जिनकी हालत देखकर शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं. खोदावन्दपुर प्रखंड क्षेत्र का उत्क्रमित मध्य विद्यालय मेघौल कन्या ऐसा ही एक विद्यालय है, जो वर्ष 1957 में स्थापित हुआ था, लेकिन स्थापना के लगभग सात दशक बाद भी यह विद्यालय अपने भवन के लिए तरस रहा है.
विडंबना यह है कि जिस विद्यालय में सैकड़ों बच्चों के सपनों को आकार दिया जाना चाहिए, वहां आज भी बच्चे बरामदे, मंदिर परिसर और तंग कमरों में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं. विद्यालय आज भी शिव-पार्वती मंदिर की जमीन पर संचालित हो रहा है. मंदिर की भव्यता और चमक देखते ही बनती है, लेकिन उसी परिसर में शिक्षा का मंदिर वर्षों से उपेक्षा का दंश झेल रहा है. यह दृश्य केवल एक विद्यालय की बदहाली नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीण समाज की उदासीनता का आईना है, जिसने वर्षों तक इस गंभीर समस्या की ओर आंखें मूंदे रखीं.
दो कमरे में आठ वर्गों की पढ़ाई, बच्चों का भविष्य सवालों के घेरे में-
विद्यालय में कुल आठ वर्ग संचालित होते हैं, लेकिन पढ़ाई के लिए मात्र दो कमरे उपलब्ध हैं. हालात ऐसे हैं कि एक कमरे में पांचवीं और छठी वर्ग की कक्षाएं एक साथ चलती हैं, जबकि दूसरे कमरे में सातवीं और आठवीं वर्ग के छात्र-छात्राओं को पढ़ाया जाता है. तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चे विद्यालय के बरामदे में बैठकर पढ़ाई करते हैं. वहीं पहली और दूसरी कक्षा के मासूम बच्चों की पढ़ाई गायत्री मंदिर परिसर में संचालित होती है. सोचने वाली बात यह है कि जहां बच्चों को शांत, सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण मिलना चाहिए, वहां वे शोरगुल, भीड़ और असुविधा के बीच पढ़ने को मजबूर हैं. बारिश हो, कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी- बच्चों की पढ़ाई किसी तरह जारी रहती है. बरसात के दिनों में बरामदे में बैठने वाले बच्चों की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है. फर्श गीले हो जाते हैं, बच्चों को सिकुड़कर बैठना पड़ता है, लेकिन मजबूरी ऐसी कि पढ़ाई रोकना भी संभव नहीं.
वर्गकक्ष ही बना कार्यालय, शिक्षकों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं-
विद्यालय की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां अलग से प्रधानाध्यापक कक्ष या कार्यालय तक नहीं है, जिस कमरे में बच्चों की पढ़ाई होती है, उसी में विद्यालय का कार्यालय भी संचालित होता है.
शिक्षकों के बैठने के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है.
कभी कुर्सी की कमी, तो कभी जगह की समस्या- इन्हीं परिस्थितियों के बीच शिक्षक अपना दायित्व निभा रहे हैं. आज जब स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और आधुनिक विद्यालयों की बातें हो रही हैं, तब इस विद्यालय की वास्तविकता बेहद दर्दनाक दिखाई देती है. यहां मूलभूत सुविधाओं का भी घोर अभाव है.
1957 से अब तक क्यों नहीं बना विद्यालय भवन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्ष 1957 में स्थापित इस विद्यालय को आखिर आज तक अपना भवन क्यों नहीं मिल सका? करीब 69 वर्षों में कई सरकारें बदलीं, कई जनप्रतिनिधि आए और गए, शिक्षा विभाग के अधिकारी बदलते रहे, लेकिन विद्यालय की तस्वीर नहीं बदली.
स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार भवन निर्माण की मांग उठी, लेकिन वह फाइलों और आश्वासनों से आगे नहीं बढ़ सकी. चुनाव के समय शिक्षा और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा के प्रति सामूहिक उदासीनता का परिणाम भी है.
दुखद पहलू यह है कि जिस गांव और समाज में मंदिरों के निर्माण और सौंदर्यीकरण के लिए लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, वहीं बच्चों की शिक्षा के लिए एक समुचित भवन तक उपलब्ध नहीं कराया जा सका.
मंदिर भव्य, लेकिन शिक्षा का मंदिर बदहाल-
विद्यालय परिसर में स्थित शिव-पार्वती मंदिर की भव्यता लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है. मंदिर का निर्माण और रखरखाव काफी बेहतर तरीके से किया गया है. धार्मिक आयोजनों में भी यहां अच्छी भागीदारी होती है, लेकिन उसी परिसर में शिक्षा का मंदिर बदहाली की जिंदगी जी रहा है.
यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है. क्या समाज की प्राथमिकताओं में शिक्षा पीछे छूट चुकी है? क्या बच्चों का भविष्य धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं से कम महत्वपूर्ण हो गया है?
गांव के बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि वर्षों पहले समाज और जनप्रतिनिधियों ने गंभीर पहल की होती, तो आज बच्चों को इस तरह कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई नहीं करनी पड़ती.
फिर भी हार नहीं माने शिक्षक, विपरीत परिस्थितियों में निभा रहे जिम्मेदारी- विद्यालय की सबसे बड़ी सकारात्मक बात यहां के शिक्षक हैं, जो तमाम अभावों के बावजूद बच्चों के भविष्य को संवारने में पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ जुटे हुए हैं. विद्यालय की प्रभारी प्रधानाध्यापिका इन्द्राणी कुमारी सीमित संसाधनों के बीच भी विद्यालय और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार प्रयासरत हैं. महिला प्रधानाध्यापक होने के बावजूद उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उनके साथ शिक्षक अवनीश कुमार वर्मा, चन्द्रभूषण, अंकित मिश्रा, संगीता कुमारी, मिन्टु कुमारी, कुमारी नीतु एवं पूनम कुमारी बच्चों को बेहतर शिक्षा देने में जुटे हैं.
करीब दो सौ बच्चों का भविष्य इन्हीं आठ शिक्षकों के भरोसे है-
कई बार एक ही समय में दो-दो वर्गों को संभालना पड़ता है. शोर और भीड़ के बीच बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं होता, लेकिन शिक्षक अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते.
मासूम बच्चों के सपनों पर भारी पड़ रही व्यवस्था की लापरवाही-
विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं. उनके माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाकर बेहतर भविष्य देना चाहते हैं. लेकिन जब बच्चे विद्यालय पहुंचते हैं और वहां उन्हें बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं मिलती, तो यह व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है. एक तरफ सरकार “सब पढ़ें, सब बढ़ें” का नारा देती है, दूसरी ओर बच्चों को बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है.
यदि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों की यही स्थिति रही, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना कैसे पूरा होगा?
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में-
स्थानीय पंचायत प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी इस मामले में सवालों के घेरे में है.
विद्यालय की समस्या कोई नई नहीं है. वर्षों से लोग इस स्थिति को देखते आ रहे हैं. बावजूद इसके किसी स्तर पर गंभीर पहल नहीं हुई. गांव में सड़क, नाली, सामुदायिक भवन और अन्य योजनाओं पर चर्चा होती है, लेकिन विद्यालय भवन का मुद्दा हमेशा उपेक्षित रह जाता है. चुनाव के दौरान नेता शिक्षा सुधार की बातें जरूर करते हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर नहीं बदलती. ग्रामीणों का कहना है कि यदि सामूहिक प्रयास किया जाए, तो विद्यालय के लिए भूमि और भवन दोनों की व्यवस्था संभव है.
क्या शिक्षा केवल भाषणों तक सीमित है?
देश में नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट एजुकेशन जैसे बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन मेघौल कन्या विद्यालय जैसे संस्थानों की स्थिति उन दावों की सच्चाई सामने ला देती है. जहां बच्चे बरामदे और मंदिर परिसर में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हों, वहां आधुनिक शिक्षा की बातें खोखली लगती हैं. सरकार यदि वास्तव में शिक्षा को प्राथमिकता देती है, तो सबसे पहले ऐसे विद्यालयों की पहचान कर उनके लिए तत्काल भवन निर्माण की व्यवस्था करनी चाहिए.
बच्चों का भविष्य बचाने के लिए अब ठोस पहल जरूरी-
उत्क्रमित मध्य विद्यालय मेघौल कन्या की स्थिति अब केवल समाचार का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मामला बन चुका है. जरूरत है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधि और ग्रामीण समाज मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करें. विद्यालय के लिए स्थायी भवन, पर्याप्त वर्गकक्ष, कार्यालय, पुस्तकालय, शौचालय और खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था तत्काल होनी चाहिए. यदि आज भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां व्यवस्था की इस लापरवाही की कीमत चुकाती रहेंगी.
आखिर कब मिलेगा शिक्षा के इस मंदिर को सम्मान?
69 वर्षों से बिना भवन के चल रहा यह विद्यालय आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि शायद किसी दिन व्यवस्था जागेगी, कोई जनप्रतिनिधि संवेदनशील होगा, समाज शिक्षा की ताकत को समझेगा और बच्चों को उनका अधिकार मिलेगा. शिव-पार्वती मंदिर की छाया में चल रही यह पाठशाला आज केवल शिक्षा नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और उपेक्षा की कहानी कह रही है. अब देखना यह है कि सरकार, प्रशासन और समाज इस पुकार को कब सुनता है- क्योंकि सवाल केवल एक विद्यालय का नहीं, बल्कि उन मासूम सपनों का है जो हर दिन बरामदे और मंदिर की चौखट पर बैठकर अपने भविष्य का इंतजार कर रहे हैं.